मैं बहुत छोटा था

मैं बहुत छोटा था

पर ख़्वाब बड़े थे

रास्ते मंज़िलों के

आँखों में पड़े थे

मेरी नन्ही उँगलियों ने

कितने सपने गिने थे

मैं चल दिया था

संग हौंसले जड़े थे

दुआएँ ढेर सारी

धमनियों में घुले थीं

मेरी रौ में रवानी थी

तिश्नगी में सने थे

पथरीली राहें मेरी थी

धूप के छींटे मिले थे

मैं उतना गिन न पाता था

तलवों में जितने आबले थे

सुकूं भी पास आता था

ओस से जब  मिले थे

सफ़र की ताप सहकर

आबो-ताब मेरे बढ़े थे

न जाने कब कारवाँ से

परे अकेले हम खड़े थे

मंज़िलें पास थी जितनी

ज़मीं से उतने फ़ासले थे

मैं थकता तो नहीं था

पर अब ख़ुद के गिले थे

सुकूं का मर्ज़ था ऐसा

ज़मीं फाँके  पड़े थे

राहों में चलके मैंने

सपनों के गुहर चुने थे

गुहर के भार में दबकर

भँवर के जाल में फंसकर

ख़्वाबों के राह से हटकर

क्यों दुनिया से हम लड़े थे

मुक़ाम पे आकर देखा तो

सुरूर की अब इंतहा थी

जब उस ऊँचे टीले पे बैठे थे

ख़ुश-फ़हम और हम अकेले थे

तिश्नगी=तृष्णा प्यास

गुहर=मोती

सुरूर=नशा

यतीश १७/१०/२०१७

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