ड्राइविंग का डर

ड्राइविंग का डर

मुझे हमेशा से ड्राइविंग से डर लगता था। पर बचपन में गाड़ियों के पीछे लटकने से कभी डर नहीं लगा।गाड़ियों के पीछे लटककर स्कूल जाने का आनंद किसी भी महँगी से महँगी गाड़ी में बैठने से कहीं ज़्यादा बेहतर होता है।दसवीं कक्षा के बोर्ड की परीक्षा में  रोज़ सड़क यात्रा (लगभग २२किलोमीटर) बालू ढोने वाले ट्रक या ट्रैक्टर के पीछे लटक कर ही तो की थी ।

लखीसराय(बिहार राज्य का अनुमंडल जो अब ज़िला बन गया है क्यूल नदी में होने वाले बालू खनन और उसके कारण होने वाले रक्त रंजित युद्ध के लिए भी प्रसिद्ध है) से तेतरहट आना-जाना अपने आप में एक अनूठा व बेहद मनोरंजक अनुभव था। समय पर पहुँचने की गारंटी थीं वो गाड़ियाँ। कई बार तो साइकल की हुक को अलग-अलग ट्रैक्टरों और ट्रकों में फंसा कर भी यात्राएँ की थी।उस दिन दसवीं की अंतिम परीक्षा थी,वो भी संगीत की,मैं तड़के घर से निकल चुका था। काम की बात ये है कि उन दिनों संगीत अच्छे नम्बर से पास होने की सबसे आसान कुंजी थी ।

जैसे ही घर से निकला सामने बालू भरा ट्रक ख़ाली दिख गया, तो आँखे एक साथ चमक गयी मन मचल उठा और झट से लपक कर मैं ट्रक के पीछे चढ़ कर बैठ गया।ट्रक में बालू के ऊपर बैठकर प्रकृति को निहारना आपकी रूह को एक अलग आयाम देता है।

चलती ट्रक पर हवाओं के झोंके आपको अलादिन के क़ालीन पर बैठने का दिव्य अनुभव प्रदान करते हैं। हिचकोलें ऐसी जैसे क़ालीन ऊपर नीचे हो रही हो ।ट्रक के अनचाहे ब्रेक आपको ज़मीन पर पटकते भी रहते,पर मन फिर क़ालीन पर उछल-उछल कर बैठ जाता ।ड्राइवर  की नज़र तब तक पड़ चुकी थी मुझपर ।ट्रक तेतरहट गाँव कब पहुँच गया पता ही नहीं चला ।गंतव्य तक पहुँचते ही मनचले ड्राइवर ने ब्रेक लगाने के बदले ट्रक की स्पीड बढ़ा दी और मुझे अचानक दिन में चाँद तारे दिखने लगे। बोर्ड की परीक्षा का क्या होगा? ये पहला स्वाभाविक प्रश्न मन में उठा और दिमाग़ कौंध गया ।मन बेचैन हो उठा,घबरा गया और अब कैसे उतर पाऊँगा ट्रक से नीचे, दिमाग़ ट्रक की गति से तेज़ चल रहा था।अचानक मेरी नज़र एक लोहे की छड़ पर गयी जो ट्रक के ऊपर वाले डेक पर रखी थी ।उस समय वो साधारण छड़ मेरी अनचाही समस्या का असाधारण हल बनता प्रतीत हुआ था।विपरीत परिस्थितियों में असीम साहस और धैर्य दोनो एक साथ चाहिए होता है।उस समय दिमाग़ को नियंत्रित रखना बहुत ज़रूरी होता है।

मैंने छड़ उसके सामने वाले शीशे के मध्य लटका दिया था और छड़ लटकाते ही मनचले ड्राइवर की मस्त चाल स्वयं ढीली पड़ने लगी।उसे समझ में आ चुका था कि अब बस फ़्रंट ग्लास फूटने ही वाली है ।उसके पैर स्वतः ब्रेक दबाते चले गए।

लखीसराय के माध्यमिक स्कूल श्री दुर्गा उच्च विद्यालय से पटना साइन्स कॉलेज का मेरा सफ़र उस दुर्घटना के टल जाने से बेहद आसान हो गया।मेरे लिए वो क्रांति के दिन थे ।स्वच्छंद आज़ादी और यायावरी के दिन।उन्मुक्त वास्तविकता को चखने और चूमने के दिन।बहुत सी अनकही बातों को गाँठ में बाँधने के दिन।

उन सारी भावनाओं के उद्वेग को पोटली में बाँध कर सफ़र में क्रमशः अपने आप को सूटकेस ,अटैची और अंत में लैप्टॉप में बंद करते चला गया।सफ़र ने एक अलग ही गति पकड़ ली थी।समय ,महीना और वर्ष तेज़ी से बीतते जा रहे थे मानो मैं ट्रेन के सफ़र में हूँ और खिड़की में सामने से पीछे भागते दृश्य -परिदृश्य को मौन भाव से देखे जा रहा हूँ ,जो बस मेरे ज़ेहन में रफ़ूँ होती जा रही थीं टाँके लगे जा रहे थे ।मेरे सफ्हों ने किताब की शक्ल लेनी शुरू कर दी थी।

एक तरह का अंदरूनी सफ़र चल रहा था वह।ख़ुद के अंदर भी और बाहर भी।अंदर और बाहर दोनो की आदतें वातावरण बदलने के साथ बदल रहीं थी।मैं बदल रहा था पर बहुत सारे बदलाव के बावजूद सबकुछ नहीं बदलता जैसे हवा,पानी,गालियाँ और वो संस्कार जो ठूँसे नहीं गए हों, सींचे गए हो माँ के पसीने से ।

समय ने एक दशक की करवट ले ली है और मैं अब इन दिनों कोलकाता शहर और इसकी हवा में तैर रहा हूँ सरकारी मुलाजिम बनकर। साइकल से शुरू हुआ सफ़र अब ड्राइवर के पीछे वाली सीट तक पहुँच चुका था। जो आज भी नहीं बदला उनमें से एक है कि मुझे अब भी ड्राइविंग से उतना ही डर लगता है।पर कभी कभी जिस बात से आपको ज़्यादा डर लगता हो मुक़द्दर आपके क़िस्मत की लकीर को उसी सिरा से ही जोड़ देता है ।गोल्फ़ खेलने की लत ने मजबूर कर दिया कि मैं ख़ुद ही ड्राइविंग करूँ ।सुबह-सुबह ५ से ५:३० बजे किसी भी अन्य को अपने साथ परेशान करना पचा नहीं पाया और स्वयं ड्राइविंग करने की हिम्मती शुरुआत कर दी।

पुराना डर आज भी वहीं कहीं था दुबका हुआ ,पर कुछ ही दिनों में डर के ऊपर उमंग का पर्दा चढ़ गया जैसे किसी दर्पण पर धूल की परत जम गयी हो,ख़ुद का चेहरा नहीं दिख पाता । वो दर्पण नहीं बदलता, शीशा साबुत है अपने आइना होने की वास्तविकता के साथ और सिर्फ़ आँखों पर पर्दा चढ़ा है उमंग का।

आदतन अब मैं सड़क पर आते -जाते बच्चों को देखकर मुस्कुरा देता, थोड़ा और ख़ुश हो लेता।उन बच्चों की हँसी धीरे-धीरे मुझ पर छाने लगी और मेरी आदतों में शामिल हो गयी।वो नन्हें मेरे थके जीवन में ऊर्जा का संचार कर रहे थे।अचानक चौराहे पर बिक रहे सारे बलून ख़रीद लेता।  ख़ुशी की नन्ही नन्ही तरंगे जो बेचने वाले बच्चों के अधरों से तैरते हुए मेरे सीने में बिना नॉक किए छुप जाते और  दिल अपनी आयत में इज़ाफ़ा करता जाता ।अब ये रोज़ का सिलसिला बन गया, आदतें इतनी बिगड़ी की रास्ते में हर आने-जाने वाले जो बिना सिग्नल के रास्ता पार करना चाहते, उन्हें देखते ही मेरी गाड़ी रुक जाती और वो मुझे प्यारी सी हँसी मुस्कुराहट रिटर्न गिफ़्ट की तरह दे देते, मैं थोड़ा और मंत्र मुग्ध हो जाता । ये मुस्कुराहट का नया और नायाब नशा था मेरे लिए। रोज़ाना जिसका डोज़ बढ़ता ही जा रहा था।बूढ़ी अम्माँ ,हाथ में बच्चे को पकड़े परेशान पिता,थरथराती लाठी और लड़खड़ाते बुज़ुर्ग, हर एक को गाड़ी रोक कर रास्ता पार करने देना मेरे सुकून का सबसे बड़ा स्रोत बन गया था ।इन सभी में कहीं ड्राइविंग के डर ने बैक सीट ले ली थी ,छुप सा गया था,जैसे धूल क़ालीन के नीचे छुप गयी हो अपने डंक समेटे सही समय की ताक में हो। उस दिन रविवार  की एक ख़ुशनुमा सुबह थी ।गोल्फ़ क्लब मुझे अपनी ओर खींचे जा रहा था।सुबह-सुबह की ड्राइविंग बड़ी मोहक होती है,स्पीड बढ़ाते हुए गाने की आवाज़ भी बढ़ा दी थी मैंने।ठंडी हवा मेरे बालों को छू कर मुझे और दीवाना बना रही थी,एक रुहानी दीवाना ।ड्राइविंग करते वक़्त अक्सर कविताओं का एक सिरा आपके ज़ेहन में उतरता है और आपका मन उस सिरे से पूरी पतंग उड़ाने का करने लगता है ।पर वो सिराएँ क्षणिक होती हैं अगर ठीक से पकड़ी न गयी तो कटी पतंग भी हाथ नहीं आती।ये ड्राइविंग की विडम्बना रही है एक कवि हृदय के लिए ,क्योंकि अक्सर ख़याल ऐसी जगह आते जब आपके हाथ में कोई और हो या आप किसी के हाथों में हो।इस समय हाथ बँधे थे गियर और स्टियरिंग के साथ।अचानक देखता हूँ एक महिला एक बच्ची के साथ तेज़ क़दमों से ग्रीन सिग्नल में रोड पार करने बढ़ती है और आदतन मैं कोशिश करता हूँ अपनी गाड़ी रोक कर उन्हें सड़क पार करने देने की। मेरी गाड़ी के ब्रेक की आवाज़ सूनी सड़क पर चीख़ जाती है और दोनों उसी मोहक शुक्रिया भाव से मुझे देख मुस्कुराते हैं।मैं भी आदतन मुस्कुराता हूँ वो मेरे सामने से खिलखिलाते गुज़र जाते है ।मैं भी थोड़ा ख़ुश हो लेता हूँ और तभी अचानक एक और ब्रेक की चिचियाती आवाज़ बाएँ कान को सुन्न करने की कोशिश करती है ।मेरी नज़र मेरे बाएँ बैक व्यू मिरर पर पड़ती है,जिसके ऊपर कुछ सुर्ख़ गीली लकीरें टपक रही होती है।

मैं भय से कूद पड़ता हूँ अपनी ड्राइविंग सीट से और दो क़दम लेते ही बुत बन जाता हूँ बच्ची अभी भी माँ की उंगली थामे है माँ की आँखे पत्थर की तरह जम गयी है।देह अंतिम साँस के झटके ले रहा है और ममत्व अबतक शायद ज़िंदा थी आँखो में ,पत्थर आँखे बोल रही थी मुझसे “अच्छी आदतें -अच्छे परिणाम” ये हर बार संभव नहीं है भाई। धूल से जमे डर के शीशे पर अब वाइपर चल रहा था और शक्लें बिलकुल साफ़ दिख रहीं थी अपनी भी और उनकी भी………………………………………………………

 

यतीश कुमार ७/५/२०१८

2 thoughts on “ड्राइविंग का डर

  • May 15, 2018 at 2:56 am
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    Wonderfully narration of true incident in a story. Every word is giving a experience of live seen. Great sir.

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  • May 16, 2018 at 11:42 am
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    बचपन की आदतों ने एक मीठी मुस्कान, बचपन की एक मीठी कसक दिल मे उठी,याद आ गया 90 का दशक जब लगभग हर बढ़ता बच्चा सायकिल को दो ट्रेक्टर के मध्य इसी तरह चलाते हुए खुद को *अजय देवगन*समझता और साइकिल को मोटरबाइक।
    एक छंद मुक्त कविता की तरह सरकती रही ज़िंदगी बजते रहे सितार कि अचानक ब्रेक लगी सोच को और लगा उफ़्फ़फ़..”हर याद ख़ुशनुमा हो हर पल ज़रूरी नहीं”….
    शब्दों के डोर से बंधी यादों की बेजतरीं पतंग

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