ज़िन्दगी भी अब विवाहित है

सुबह मेरी, टकटकी लगाए

पलकों भरी निग़ाहों से

मुझमें बसी, ज़िन्दगी को देखती है

और मैं खामोश हो जाती हूँ,उस गहराई में

कि आईने ने सवाल पूछा है

की दर्पण क्या होता है??

और मैं भी बड़े आराम से कह देती हूँ

कि जिसमें तू जीता है ना, उस तस्वीर में

आलस सी भरी परछाई हूँ किसी की,

जो होना तो जानती है

पर ये नहीं जानती

कि हवाओं के जब रुख बदलते हैं ना

तो आईने में दरार के साथ

पहचान में भी फ़ासले आ जाते है,

कि रात भी यह समझ नहीं पाती की

आराम, दरार के किस ओर है

और इसी सोच में

बीती ज़िन्दगी की साँसे

धुँआ हो जाती है,

जिनके बरसने की उम्मीद

आसमां को भी होती है

पर तपती सी ज़िन्दगी में सूनापन

ओस की तरह हो जाता है,

जिसे चाह भर देख तो नहीं पाते

पर फिर भी उम्र

कि चाहत ज़रूर बना लेते हैं।

शायद इसलिए बादल भी

घाटाओं में उलझते हुए

इतने बरसते हैं कि सोई हुई ज़मी भी

प्यास से जग जाती है

और तितलियाँ फिर केशों के झरने तले

रसपान करते हुए ,बहती हुई,

मटकती हुई,

ज़िंदगी के आंगन में धूप सेकती मिलती है

कि थकान भी अपने पैर पसार,

बिखरती किरणों में

जलन भरी चुभन सी

सवेर होती लताओं का

महकती सवेर में,

पूजा की थाल लिए

सिंदूरी बिखेरदेती है

कि केसर सी बनी दुल्हन

जन्म- जन्मांतर के लिए

शाम की मुरली- मनोहर बन जाती है।

जहाँ सवेर बाँसुरी बजाती है

और रात, ख्वाबों में रातों के,

राधा सी थिरकती है।

कि ज़िन्दगी विवाहित है अब

कि बिना सवेर के उसकी

रात पूरी नहीं होती,

और बिना रात के सवेर की

पहचान पूरी नहीं होती।

Submitted by Sandhya Kumari

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Skip to toolbar