सत्यमेव जयते

Satyameva Jayate
सत्यमेव जयते:

हमारे शास्त्र में कहा है सत्मेव जयते नानृतम्.. फिर भी हमें प्रतीत होता रहा कि कई सदियों से हम सच्चे ईमानदार भारतवासी, विजय नहीं पराजय पर पराजय झेलते रहे। जब जब भी किसी सत्यप्रेमी को सत्ता मिली थी तो आशा की किरण दृष्टि में आई किंतु बहुत देर जीवित न रह सकी। पुन: आसुरी शक्तियों ने एकत्रित हो कर सत्य को पलायन पर विवश किया और कई वर्षों तक देश में भ्रष्ट प्रशासन ने पूर्णतया विभत्स रूप दिखाया। हर गाँव हर गली हर नगर में निराशा का ही वातावरण रहा। सब यही सोचने लगे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता।

यह था साधारण नागरिक का दृष्टिकोण, वह नागरिक जिसे सदियों की परतंत्रता के उपरांत यह निराशावाद अब नया नहीं लगता, बल्कि उनके लहू में रम चुका था। वे अब लड़ते भी नहीं थे, इसको नियति समझ कर स्वीकार करते थे कि भ्रष्ट अनपढ़ नेतायों का निरंतर चयन होता रहेगा व उनके द्वारा लादी जाती रहेंगी जातिवाद व तुष्टीकरण की अनर्गल नीतियाँ।

 

किंतु इस निराश उदास साधारण नागरिक से परे एक संस्थान ऐसा भी रहा जिसके सदस्यों ने केवल देशहित को सर्वोपरि माना, पूरे जीवन की आहुति दे दी इस महायज्ञ में। एक एक सदस्य जोड़ जोड़ कर अंतत: इतनी संख्या तक पहुँचे कि बिन वेतन बिन लोभ निस्वार्थ देश की सेवा करने वाली एक सेना खड़ी हो गई। जहाँ जहाँ भी जन साधारण को कठिनाई आई, उन्होंने सहायता की और इस प्रकार धीरे धीरे जनता के मन में अपना स्थान बनाया। यह है करोड़ों सत्यप्रेमियों की, मानवधर्मियों की सेना! इस की सदस्यता इतनी बढ चुकी है कि अब इसे पराजित करना सम्भव नहीं।

 

पाँच वर्ष पूर्व नमो की विजय हुई तो सबने कहा नमो लहर, आज भी कहते हैं कि जो भी नमो से है, डरते हैं कि नमो नहीं तो कहीं एक बार पुन: वही पुराना समय लौट आयेगा। नहीं जानते कि देश की दिशा मुड़ चुकी है, चमत्कारी कोई एक व्यक्ति नहीं, यह तो उन लाखों करोड़ों अनाम कार्यकर्तायों के अथक परिश्रम का, उनके अगणित बलिदानों कि फल है जिसे आज देश के नागरिक समक्ष देख कर भी पहचान नहीं पा रहे।

 

ध्यान से देखिये, तो आपको केवल नमो नहीं, उनके आगे पीछे राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तरों पर अनेक ऐसे व्यक्तित्व मिलेंगे जो अवसर मिलने पर नमो की ही भाँति देश की सुचारू रूप से संचालन करने में समर्थ हैं। उन्हीं की भाँति सत्यन्ष्ठ, ब्रह्मचारी, निस्वार्थी, मनस्वी व तपस्वी; साधारण से दिखने वाले सहस्रों देशभक्त जो माँ भारती पर सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर हैं।

 

यदि आप अब अभी नहीं जान पाये तो बता दें कि ये संस्था है राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ और आज देश में जो भी हो रहा है वह चमत्कार नहीं, आकस्मिक नहीं, अपितु संघ संस्थापक गुरु हेगडेवार जी के सौ वर्ष पुराने प्रण का परिणाम है। पहले वह भी गांधारी के ही अनुयायी थे, और कांग्रेस के सदस्य भी। किंतु जब उन्होंने देखा कि गांधी केवल कहने को सत्यनिष्ठ हैं, आचरण में नहीं तो उनके नेतृत्व पर विश्वास न रहा। मात्र एक सदस्य से उन्होंने नई संस्था की नींव रखी। लक्ष्य केवल एक, पूर्ण सत्यनिष्ठा के बल पर देश का पुनरोत्थान।

 

जिस सूक्ति से आरम्भ किया था उसी को पूर्ण रूप से प्रस्तुत कर लेखनी को विराम देती हूँ :

 

“ॐ सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमत्मनुष्यो ह्यात्मकामो यत्र तत्सत्यस्य परं निधानं॥

 

विजय सत्य की होती है, असत्य काी नहीं । सत्य के पथ पर चल कर ही से ही देवतायों के यान आगे बढ़ते है । जिस पथ पर चल कर मनुष्य आत्मानंद को प्राप्त करता है, वही सत्य का परम् धाम है।”

 

सत्य का मार्ग आख़िर है क्या? आज यदि नमो के जीवन के क्षण क्षण का अनुसंधान करें तो पायेंगे कि सत्य की साधना इतनी सरल नहीं जितनी हम समझते हैं। जब सत्य कहने में कोई व्यक्तिगत हानि नहीं, तब सत्य कहने में कोई साधना भी नहीं। सत्य का पूर्ण संधान करने का अर्थ है कि चाहे जो भी परिस्थिति क्यों न सामने हो, चाहे धन की हानि हो या प्राण की, आपके मुख से असत्य का उच्चारण नहीं होगा। यह वही पथ है जिस पर चल कर श्रीराम ने वनवास स्वीकारा था, वही पथ है जिस पर चल कर दशम गुरु ने चार साहिबजादों का बलिदान दिया था। जब तक सत्य के प्रति ऐसी अटल निष्ठा होगी तब विजय कैसे न सम्भव होगी?

 

#अनकही

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