मैं-अहंकार या जिम्मेदारी?

मैं-अहंकार या जिम्मेदारी?

नमस्कार दोस्तो,

आइये आज हम बात करते है मैं की,

मैं शब्द का उपयोग हमेशा से अहंकार का प्रतीक रहा है।और ऐसा  इस कारण भी रहा है क्योंकि हमारी धार्मिक किताबों में ऐसा लिखा गया है और आने वाले महान लोगो ने भी ऐसा कहा है।और जब इस प्रकार धार्मिक किताबें और महान लोग कुछ कहते है,तब लोग बिना सोचे उस बात को सच मान लेते है।देखा जाए तो मैं एक शब्द है,अब शब्द तो कभी अहंकार नही हो सकता,भावना ही अहंकार व्यक्त करती है।किसी महान व्यक्ति द्वारा लिखी गयी किताब या उसके द्वारा कही गयी बात को हर इंसान समझ सके ऐसा जरूरी नही।

अब मैं शब्द को अगर मैं अपनी समझ से व्यक्त करूँ तो मैं तो यही कहूंगा कि मैं अहंकार भी हो सकता है और एक जिम्मेदारी भी।अब सवाल आता है कि क्या सच में मैं जिम्मेदारी हो सकती है क्योंकि अभी तक तो हमने मैं को हमेशा अहंकार के रूप में देखा है।और सभी ने आजतक यही समझाया है।

आइये ज़रा गौर फरमाइए,

एक इंसान कहता है कि

मैं इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ।

इस वाक्य में क्या नज़र आता है।

अहंकार??

आप कहोगे हाँ।

ठीक है मान लिया।

लेकिन क्या वो इंसान सच में सबसे शक्तिशाली है?

अगर ऐसा है तो उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।कि वह वो काम करे जिससे कोई और ना कर सके।

एक डॉक्टर कहता है कि

मैं डॉक्टर हूँ।

उस व्यक्ति का ये कहना कि

मैं डॉक्टर हूँ।

उसकी जिम्मेदारी बढ़ा देता है बीमार लोगो के प्रति।

तो मैं अहंकार कब होता है???

क्या हम यह मान कर चलें कि

धार्मिक किताबों में जो लिखा है या महान व्यक्तियों ने कहा वो गलत कहा?

लेकिन यह सब गलत कैसे हो सकते है।

इनमें से भगवान के अवतार भी है।

भगवान कैसे गलत कह सकते है।

तो जवाब यह है कि भगवान ने,महान लोगो ने,धार्मिक किताबों में जो लिखा है वो गलत नही है।

हमने जो समझ है वह गलत है।

कैसे?

उन्होंने कहा कि मैं अहंकार है।

क़िताबों में भी यही लिखा है।

और  आज कल जो धर्म गुरु है वह भी यही कह रहे है।

शायद सब ने यही कहा इसीलिए यह सब भी यही कह रहे है।

पुरानी बातों को दोहराने के लिए सोचने की जरूरत नही है।

सोचना तो तब पड़ता है जब उन बातों को समझना पड़ता है।

फिर अहंकार क्या है???

खुद को वह कहना जो आप नही है,यह अहंकार है।

बस इतनी सी बात है।

जो आप खुद को कह रहे है अगर आप वो है तो यह अहंकार नही।

अगर आप खुद को जो कह रहे है और वो आप नही है तो वह अहंकार है।

बस इतनी सी बात

मैं को अहंकार भी बना देती है और जिम्मेदारी भी।

अब सोचो एक इंसान कहता फिर रहा है कि वह डॉक्टर है।

लेकिन वो नही है,तो फिर ना तो उसके ऊपर कोई जिम्मेदारी है और ना वो किसी बीमार का इलाज कर सकता है।

वह बस खुद को दूसरों की नज़रों में ऊंचा दिखाने के लिए बोल रहा है।

यह साफ साफ अहंकार है।

लेकिन अगर वो सच मे एक डॉक्टर होता तो

उसके ऊपर जिम्मेदारी भी होती और वह बीमार इंसान को ठीक भी कर देता।

आज के समय मे कोई अगर खुद को भगवान कहे और वो सच में भगवान है।

तो उसकी जिम्मेदारी भी भगवान वाली ही होगी,और वह वो काम कर सकता है जो भगवान करता है।

लेकिन अगर कोई इंसान खुद को भगवान कहे लेकिन वो भगवान ना हो तो वह ना तो वो जिम्मेदारी निभा पायेगा और ना भगवान वाले काम कर पायेगा।

जाते जाते बस यही कहना चाहूंगा कि किसी भी पुरानी से पुरानी महान से महान इंसान द्वारा कही बात को सुन कर बस ऐसे ही मत मान लेना।

सोचना समझना फिर मानना, क्योंकि अगर महान इंसान इतनी सीधी और आसान बात कहते जिसे समझने की जरूरत नही पड़ती तो वह महान नही होते।

तो आप कौन है?

और आपका मैं क्या है?

अहंकार या जिम्मेदारी?

सोचिये और खुश रहिये ,खुशियां बाँटिये।

-योगेन्द्र सिंह,मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश)

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